इस्लाम सादी के कुछ अहम् कानून.

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इस्लामी शादी  का कानून.

दुनिया  के  सारे मुसलमानो की  शादियाँ इस्लामी कानून  के तहत  होती  है।  इस्लामी कानून अलग -अलग  हिस्सों  में  बंटा हुआ  है -यानि सुन्नी मुसलमानो के लिए हनफ़ी  कानून है , और शिया मुसलमानो के लिए  इसनासरि    कानून  है।

कौन इस्लामी कानून के तहत निकाह कर सकता है ?

जी  हाँ !सिर्फ मुस्लमान  ही इस्लामी कानून के तहत शादी कर सकते है।

इस्लामी निकाह कैसे रचाया जाता है ?

  • इस्लामी शरा के मुतबिक पहले निकाह का पैगाम लड़के की तरफ दिया जाता है। इस पैगाम को लड़की कुबूल करती  है  या  इइन्कार करनी है।  अगर पैगाम के देने और कुबूल  करने को निकाह कहते है।
  • निकाह जुबानी भी हो  सकता है.
  • निकाह मौलवी  करवाता है जो गवाहों के सामने होती है.
  • मौलवी के पास एक शादी की किताब होती हैं जिस पर मौलवी निकाह दर्ज कराते।  इस किताब पर दूल्हा -दुल्हन दोनोके दस्तख़त भी होने चाहिये.
  • निकाह की रजामन्दी अगर लिखित में हो तो उसे निकाहनामा  कहते है। दोनों को निकाहनामा पर दस्तखत करने होंगे.
  • निकाह के समय दूल्हा दुल्हन  को एक रकम देते है। यह मैहर की रकम होती है.
  • निकाह का पंजीकरण जरुरी नहीं  होता है। लेकिन बेहतर होता है अगरपंजीकरण की लिखा -पढ़ी पूरी हो।  वह इसलिए कभी शौहर -बीवी के झगड़े के वक्त अदालत में जाने की नौबत आई तो यह साबित नहीं करना पड़ता है की शादी हो चुकी है.

क्या निकाह पर गवाहों की मौजूदगी जरुरी है ?

सुन्नी मुसलमानो के निकाह में गवाह की मौजूदगी जरुरी है। दो पुरुष गवाह जरुरी है। अगर दो पुरुष ना हो ,तो एक मर्द और दो औरते गवाह  बन सकती है। शिया मुसलमानो के निकाह में गवाहों की मौजूदगी जरुरी नहीं है.

शादी तीन तरह की होती है ,सही ,बातिल और  फ़ासिद.

सही यानि जायज शादी :

शादी जायज तब होती है जब इस्लामी  शादी के सारे शराए पूरे किए गए हो। जैसे निकाह ,गवाह ,मौलवी और बाकि सब शर्ते। यह सबसे सही किस्म की शादी है और यह क़ानूनी तौर पर जायज मानी जाती है। यह पति-पत्नी का समाज में संबंध बताती है.

बातिल यानि  नाजायज शादी:

यह वह शादी है जिसमे कोई जरुरी इस्लामी शरा पूरी ना हुई हो। ऐसी शादी क़ानूनी तौर से नाजायज है। मिसाल के तौर पर अगर दूल्हा और दुल्हन का कोई करीबी रिश्ता हो तो वह शादी जायज शादी नहीं है.
अब्दुल्ल ने अपनी भांजी रेहाना से शादी की। निकाह जायज तरीके से हुआ ,मेहर की रकम ,गवाह सब पूरी तरह से किया गया। क्या ऐसी शादी जायज है?

नहीं यह शादी जायज नहीं है क्योंकि रेहाना और अब्दुल्ल का खून का का सगा रिश्ता है यानि अब्दुल्ल रेहाना के सगे मामू है। ऐसी शादी कभी जायज नहीं हो सकती है.

फ़ासिद:

यानि वह शादी जिसमे किसी इस्लामी शरा की कमी हो लेकिन बाद  में वह कमी पूरी की जाए। कमी पूरी कर देने पर शादी को जायज करा  दिया जाता है। जैसे अगर सुन्नी मुस्लमान मर्द किसी बुत परस्त लड़की से शादी करे तो वह शादी नाजायज है। अगर बाद में लड़की मुस्लमान बन जाए तो शादी जायज हो जाती है.
सबाना  बेवा हो जाती है और इद्दत का  वक्त पूरा होने से पहले वह एक बाबर से निकाह कर लेती है। इस्लामी कानून के हिसाब से एक बेवा दोबारा शादी तब ही कर सकती है जब उसके इद्दत का वक्त पूरा हो जाता है जो तीन माहवारी का होता है। सबाना को मेहर तब ही मिलेगी अगर यह साबित हो जाए की परवीन और  बाबर की शादी -शुदा सम्बन्ध रहा हो। अगर ऐसी शादी से बच्चे पैदा हो तो वह जायज औलाद मने जाएंगे.
शियाओं में यह तीसरी किस्म की शादी नहीं मणि जाती है सिर्फ जायज और नाजायज शादी मानी जाती है.

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